संत तुकाराम महाराज की जीवनी– Tukaram Maharaj In Hindi

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दोस्तों http://mysmarttips.in  में आपका फिर से स्वागत है । आज हम जानेंगे संत तुकाराम महाराज का जीवन चरित्र ।संत तुकाराम महाराज का मराठी भक्ति परंपरा में अनन्य साधारण स्थान है । संत तुकाराम महाराजने संसार के सर्व सुख-दुःखों का सामना साहस से कर अपनी वृत्ति विठ्ठल चरणों में स्थिर की । भागवत धर्म मंदिर का कलश अर्थात संत तुकाराम महाराज की जानकारी देनेवाला यह लेख ……..

संत तुकाराम महाराज की जीवनी – Tukaram Maharaj In Hindi

जन्म व पूर्वज –
संत तुकाराम महाराज की जन्मभूमि और कर्मभूमि देहु गांव इतिहास में एक पुण्यभूमि स्थल है।तुकाराम महाराज के तीन सौ साल पहले, तुकोबा के पूर्वज विश्वंभरबाबा देहू गांव में रहते थे। इस परिवार के कुलदैवत भगवान विट्ठल थे।विश्वंभरबाबा के गुजरने के बाद उनके दो पुत्र हरी और मुकुंद दोनों अपने मूल क्षत्रिय धर्म की और चले गए । उन्होंने राजाश्रय प्राप्त किया और दोनों सेना में भर्ती हो गए,कुछ साल बाद एक युद्ध में दोनों शहीद हो गए।मुकुंद की पत्नी सति गई ,और हरी की पत्नी गर्भवती थी वह वापस देहु को आ गई । उसको बेटा हुवा बेटे का नाम विट्ठल रखा ।विट्ठल का पुत्र पदाजी,पदाजी का पुत्र शंकर, शंकर का पुत्र कान्होबा ,और कान्होबा के पुत्र बोल्होबा थे ।बोल्होबा को सावजी,तुकाराम और कान्होबा यह तीन पुत्र थे ।
संत तुकाराम का जन्म महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले के अंतर्गत ‘देहू’ नामक ग्राम में शके 1520; सन् 1598 में हुआ था। इनके पिता का नाम ‘बोल्होबा’ और माता का नाम ‘कनकाई’ था।इनके कुल के सभी लोग ‘पंढरपुर’ की यात्रा (वारी) के लिये नियमित रूप से जाते थे।

विपत्तियाँ –
देहू ग्राम के महाजन होने के कारण तुकाराम के कुटुम्ब को प्रतिष्ठित माना जाता था।संत तुकाराम प्राय: 18 वर्ष के थे, तभी इनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया।बड़े भाई सावजी की पत्नी का अठारह वर्ष की आयु में निधन हो गया। इसी समय में हुए भीषण अकाल के कारण महाराज की प्रथम पत्नी व छोटे बालक की भूख के कारण तड़पते हुए मृत्यु हो गई। तुकाराम चाहते तो अकाल के समय में अपनी महाजनी से और भी धन आदि एकत्र कर सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। विपत्तियों की ज्वालाओं में झुलसे हुए तुकाराम का मन प्रपंच से ऊब गया।

परमार्थ की ओर मार्गक्रमण –

भामगिरी पाठारी वस्ती जाण केली । वृत्ती स्थिरावली परब्रह्मी ॥१॥
सर्प विंचू व्याघ्र अंगाशी झोंबले । पिडू जे लागले सकळीक ॥२॥
पंधरा दिवसामाजी साक्षात्कार झाला । विठोबा भेटला निराकार ॥३॥

संत तुकाराम महाराज को उनके सद्गुरु बाबाजी चैतन्य ने स्वप्न में दृष्टांत देकर गुरुमंत्र दिया । पांडुरंग के प्रति निस्सिम भक्ती के कारण उनकी वृत्ति विठ्ठल चरणों में स्थिर होने लगी । आगे मोक्षप्राप्ति की तीव्र उत्कंठा के कारण तुकाराम महाराजने देहू के निकट भामचन्द्र पर्वतपर एकांत में ईश्वर साक्षात्कार के लिए निर्वाण प्रारंभ किया । वहां पंद्रह दिन एकाग्रता से अखंड नामजप करनेपर उन्हें दिव्य अनुभव प्राप्त हुआ।

सिद्धावस्था प्राप्त होने के पश्चात संत तुकाराम महाराजने ‘संसार सागर में डूबनेवाले ये लोग आंखों से देखे नहीं जाते’ ऐसा दुःख व्यक्त कर लोगों को भक्तिमार्ग का उपदेश किया । वे सदैव पांडुरंग के भजन में मग्न रहते थे । तुकाराम महाराज ने अपने हिस्सों के कर्ज खते नदी में डुबाया और लोगोंको कर्ज से मुक्ति दी । विट्ठल का नाम अमृत समान है , वही मेरा जीवन है, ऐसा वे कीर्तन के माध्यम से बताते थे । ‘धर्म की रक्षा हेतु हमे बहुत प्रयास करने हैं’, यह कहते हुए संत तुकाराम महाराजने वेद एवं धर्मशास्त्र का सदैव समर्थन किया । तुकाराम महाराजने संकट की खाई में गिरे हुए समाज को जागृतिका, प्रगति का मार्ग दिखाया । परतंत्रता में हीनदीन बने समाज को सात्त्विक पंथ दिखाया तथा भक्तियोग सन्मानित किया । हजारों भक्तों को एक छत्र के नीचे लाया । जैसे विचार वैसा ही आचार होना चाहिए, यह समाज को सिखाया ।

अभंग की रचना –
तुकाराम महाराज ने स्वय: का तो उद्धार किया था ,पर अब उनको सभी लोगोंका उद्धार करना था ।उनको परमात्मा का सन्देश लोगोंतक पहुंचना था ।संत तुकाराम बताते थे की मुझे संत नामदेव ने स्वप्न में दृष्टांत देकर अभंग लिखने के लिए कहा है ।संत तुकाराम अभंग लिखते लिखते कीर्तन भी करने लगे थे । कीर्तन में विट्ठल भक्ति तो समझाते थे लेकिन उसके साथ लोगोंको अंधश्रद्धा से दूर रहने का सलाह देते थे ।
इसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा।पर कुछ लोग विरोध भी करने लगे।अभंग छंद में रचित तुकाराम के लगभग 4000 पद प्राप्त हैं। इनका मराठी जनता के हृदय में बड़ा ही सम्मान है।

गाथा डुबोने के तेरह दिन पश्चात वह पुनः नदी से ऊपर आ गई –
तुकाराम महाराजने संस्कृत के वेदों का अर्थ प्राकृत भाषा में बताया था । इसलिए वाघोली गांव के रामेश्वरशास्त्रीने तुकाराम महाराज के अभंगों की गाथा इंद्रायणी नदी में डुबोने का आदेश दिया । गाथा डुबोने के तेरह दिन पश्चात वह पुनः नदी से ऊपर आ गई । यह देखकर रामेश्वरशास्त्री को पश्चाताप हुआ तथा वे महाराज के शिष्य बन गए ।और आगे जाकर रामेश्वरशास्त्री ने तुकाराम महाराज की आरती लिखी ।उसमे वह
बताते है तुकाराम महाराज भगवान विष्णु का अवतार है ।

विरक्त संत तुकाराम महाराज –
संत तुकाराम महाराज और छत्रपति शिवाजी महाराज समकालीन थे ।संत तुकाराम महाराज की कीर्ति छत्रपती शिवाजी महाराज के कानोंतक पहुंच गई थी । शिवाजी महाराजने तुकाराम महाराज को सम्मानित करने के लिए अबदगिरी, घोडे तथा अपार संपत्ति भेजी । विरक्त तुकाराम महाराज ने वह सर्व संपत्ति लौटाते हुए कहा कि ‘पांडुरंग के बिना हमें दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।’तुकाराम महाराज ने बताया सोना,पैसा यह तो हमारे लिए मिट्टीजैसा है । और इस संपत्ति का स्वीकार नहीं किया ।

वैकुंठगमन –
महाराष्ट्र में भागवत धर्म की नींव संत ज्ञानेश्वर ने रखी थी और तुकाराम महाराज ने उसे शिखर पर रखा था; कहा जाता है। इस वजह से, तुकाराम महाराज के जीवन और साहित्य में भागवत धर्म की लंबी परंपरा पूरी हुई।उन्होंने अनगिनत ‘अभंगों’ की रचना की थी। उनकी कविताओं के अंत में लिखा होता था कि- “तुका म्हणे ” यानी “तुकाराम महाराज ने कहा…”। उनकी राह पर चलकर ‘वारकरी संप्रदाय’ बना, जिसका लक्ष्य था- समाजसेवा और हरिसंकीर्तन मंडल। इस संप्रदाय के अनुयायी सदैव प्रभु का ध्यान करते थे। तुकाराम महाराज ने कितने ‘अभंग’ लिखे, इनका प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन मराठी भाषा में हज़ारों ‘अभंग’ तो लोगों की जुबान पर ही हैं।संत तुकाराम महाराज के साधुत्व एवं कवित्व की कीर्ति सर्वत्र फैल गई । उस आनंदावस्था में उन्हें स्वयं के लिए कुछ भी प्राप्त नहीं करना था । वे तो केवल दूसरोंपर उपकार करने हेतु ही जीवित थे । ( ‘तुका म्हणे आता । उरलो उपकारापुरता ।’) अपनी भक्ति के बलपर महाराजने आकाश की ऊंचाई प्राप्त की तथा केवल ४१ वर्ष की आयु में सदेह वैकुंठगमन किया । फाल्गुन वद्य द्वितिया को तुकाराम महाराज का वैकुंठ गमन हुआ । यह दिन ‘तुकाराम बीज’ नाम से जाना जाता है ।

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